मां नन्दा-सुनन्दा महोत्सव में ऐपण और मेहंदी प्रतियोगिता आयोजित
कार्यक्रम संयोजक बबीता साह लोहानी ने कहा कि कुमाऊं क्षेत्र में शुभ कार्यों की शुरुआत सफाई के बाद गेरू-बिश्वार से ऐपण बनाने की परंपरा से होती है। उन्होंने बताया कि गेरू उत्साह, संवर्धन और जीवंतता का प्रतीक माना जाता है, जबकि बिश्वार को संपन्नता का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने कहा कि प्रतियोगिता के माध्यम से इस पारंपरिक लोककला को जीवित रखने का प्रयास किया जा रहा है। विशेष रूप से युवाओं और बच्चों की बड़ी संख्या में भागीदारी उत्साहजनक है। इससे उम्मीद है कि उत्तराखंड की संस्कृति नई पीढ़ी तक मजबूती से पहुंचेगी।
शाखा अध्यक्ष राजेश पंत ने कहा कि गेरू-बिश्वार उत्तराखंड की पारंपरिक लोककला का महत्वपूर्ण हिस्सा है। प्रतिभागी पारंपरिक कला को आधुनिक रंगों के साथ रचनात्मक रूप देते हुए अपनी कल्पनाशीलता और हुनर का प्रदर्शन कर रहे हैं। उनकी कलाकृतियों में मां नन्दा-सुनन्दा की संस्कृति के साथ उत्तराखंड की लोक परंपराओं और रीति-रिवाजों की झलक भी देखने को मिली।
आयोजकों ने कहा कि इस तरह के आयोजनों का उद्देश्य पारंपरिक लोककला और संस्कृति को प्रोत्साहित करने के साथ नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ना है। प्रतियोगिता में बच्चों और युवाओं की भागीदारी से लोककलाओं के संरक्षण की उम्मीद मजबूत हुई है।
कूर्माचल परिषद, गढ़ी शाखा ने सभी प्रतिभागियों और सहयोगियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि सांस्कृतिक आयोजन समृद्ध विरासत को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कार्यक्रम में केंद्रीय अध्यक्ष कमल रजवार, केडी जोशी, प्रेमा तिवारी, हरीश चंद्र पांडे, तनुजा तिवारी, कमला उप्रेती, कल्पना वर्मा, रमा कांडपाल, अमित रावत, अल्का रावत, पवन डबराल, रेनुका डबराल, मृदुला तोमर, कल्पना ममगाई, भावना पाल और नवीन तिवारी सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।

